हिंदू त्योहारपर्व और त्यौहार

Sawan Somvar Vrat Katha : श्रावण महीना 2023, सोमवार व्रत कथा का महत्व ( Sawan Mahina Somvar Vrat Katha in hindi)

Pawin

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Sawan Somvar Vrat : कहा जाता है कि सावन महीना  भगवान शिव जी का महीना है.  सावन के इस महीना में पूर्ण रूप से धार्मिक रीति-रिवाजों का माहौल रहता है. हिंदू धर्म के अनुसार विशेषकर श्रावण महीने में मनाए जाने वाले इस  त्योहार को पूरे महीने मनाया जाता है.  हमारे देश की परंपरा है और हमारे धर्म के अनुसार यह महीना ईश्वर से जोड़ती है.  चाहे वह 1 दिन का त्योहार हो या पूरे महीने का हो सभी का अपना अपना महत्व रहता है. आइए जानते हैं विस्तार में सावन महीना और सावन महीने में होने वाली संपूर्ण त्यौहार के बारे में.

Table of Contents

सावन महीना कब से शुरू होती है ? (When does Sawan Month start ?)

हिंदू पंचांग के अनुसार इस बार 2023 में सावन 2 महीना का  रहेगा. हिंदू कैलेंडर अनुसार  हर साल पांचवा महीना सावन महीना होता है.जो 23 जुलाई से शुरू होकर 22 अगस्त तक समाप्त हो जाती है.  और सावन महीना का शुरुआत 4 जुलाई 2023 से लेकर 31 अगस्त 2023 तक चलेगा. इस बार का सावन पूरे 58 दिन का रहेगा. क्योंकि 18 जुलाई से 16 अगस्त तक अधिक मास होने के कारण इस बार की सावन महीना दो महीना की रहेगी. 

इस बार सावन में सोमवार कब कब रहेगा ? (This time when will it be Monday in Sawan?)

इस बार सावन कुल मिलाकर 2 महीना का रहेगा इसमें कुल 8 सोमवार रहेंगे जिसका विवरण नीचे दिया गया है.

पहला सोमवार10 जुलाई 2023
दूसरा सोमवार17 जुलाई 2023
तीसरा सोमवार 24 जुलाई  2023
चौथा सोमवार31 जुलाई 2023
पांचवा सोमवार7 अगस्त 2023
छठा सोमवार14 अगस्त 2023
सातवा सोमवार21 अगस्त 2023
आठवां सोमवार28 अगस्त 2023

सावन सोमवार व्रत का महत्व ( Sawan Somvar Vrat Mahatb )

Sawan Somvar Vrat : कहा जाता है कि सोमवार का स्वामी भगवान शिव को माना जाता है. सोमवार को साल के पूरे सोमवार भगवान शिव के श्रद्धालुओं के लिए सबसे उत्तम माना जाता है.  हिंदू धर्म के अनुसार भगवान शिव श्रद्धालुओं की सबसे प्रिय भगवान होने के कारण भी श्रावण के सोमवार का महत्व और भी बढ़ जाता है. 

पूरे साल में श्रावण ऐसा महीना है जो पूरे सावन में कुल 5 सोमवार होती है.  बाकी के महीने में सिर्फ चार ही सोमवार पड़ता है.  सावन महीना के कुल 5 सोमवार के दिन श्रद्धालु भक्तजन पूरे सोमवार पूर्ण रूप से व्रत रखते हैं और संध्या काल में भगवान शिव का पूजा के बाद तब अपना भोजन ग्रहण करते हैं.

सावन में क्या नहीं खाना चाहिए ?

 हिंदू शास्त्र के अनुसार सावन  का महीना भगवान शिव का महीना होता है ऐसे दिनों में घर में लहसुन प्याज मांग मछली शराब इत्यादि  इत्यादि खाने से बचना चाहिए.

सावन सोमवार व्रत की विधि ( Sawan Somvar Vrat vidhi )

Sawan Somvar Vrat : हिंदू धर्म में नारद पुराण के अनुसार यदि कोई व्यक्ति सोमवार का व्रत करता है तो सबसे पहले सुबह को स्नान करके भगवान शिव जी को जल और बेलपत्र  चढ़ाया  जाता है साथी शिव गौरी की पूजा भी करता है.  भगवान शिव पूजन के बाद श्रद्धालु को सोमवार का व्रत कथा अवश्य सुननी चाहिए. 

और पूरे दिन में सिर्फ एक बार ही भोजन ग्रहण करनी चाहिए. सामान्य रूप से सोमवार का व्रत  दिन के तीसरे पहर तक होता है.  इसका मतलब यह होता है कि शाम तक इस व्रत को रखा जाता है  हिंदू धर्म के अनुसार सोमवार व्रत तीन प्रकार का होता है.  पहला प्रति सोमवार व्रत,  सौम्य प्रदोष व्रत और सोलह सोमवार का व्रत,  इन सारे व्रतों के लिए पूजा करने की विधि एक ही तरह का होता है.

सोमवार का व्रत कथा (Sawan Somvar Vrat Katha )

Sawan Somvar Vrat : एक बार किसी जगह पर एक बहुत ही धनवान साहूकार रहा करता था.  उस साहूकार के घर में धन दौलत की कोई कमी नहीं होती है लेकिन  उसकी कोई संतान नहीं होने के कारण वह बहुत ही दुखी रहा करता था.  वह साहूकार अपने पुत्र प्राप्ति के लिए प्रत्येक सोमवार व्रत रखा करता था और पुरी श्रद्धा और विधि विधान के अनुसार भगवान शिव के मंदिर पर जाकर भगवान शिव और पार्वती का पूजा अर्चना करता था.

उस साहूकार का भक्ति देखकर एक दिन माता पार्वती प्रसन्ना हुई और भगवान शिव से वह साहूकार की मनोकामना और इच्छा पूरा करने के लिए अनुरोध किया. 

माता पार्वती की अनुरोध  सुनकर भगवान शिव ने माता पार्वती से कहा.  हे पार्वती,  इस जगत में हर प्राणी को उसके कर्मों का फल अवश्य मिलता है और जिसके भाग्य में जो होता है वह उसे भोगना ही पड़ता है. लेकिन माता पार्वती जी ने साहूकार की भक्ति का मान रखते हुए उनकी मनोकामना पूरा करने की इच्छा जताई थी.

 अंत में माता पार्वती के अनुरोध पर भगवान शिवजी ने साहूकार को पुत्र प्राप्ति हेतु वरदान देने का फैसला करते हुए कहा  लेकिन वरदान देते हुए भगवान शिव  कहां   उस साहूकार को पुत्र प्राप्ति तो होगी लेकिन उस बालक की आयु मात्र 12 साल की होगी. साहूकार माता पार्वती और भगवान शिव की यह बातचीत करते हुए सो रहा होता है. 

सारी बात सुनने के बाद साहूकार को ना तो इस बात की खुशी होती है और ना ही इस  से दुखी ही होता है फिर भी पहले जैसे भली-भांति भगवान शिव की पूजा अर्चना करते रहता है.

 कुछ समय बीतने के बाद उस साहूकार के घर में एक पुत्र का जन्म होता है. फिर वह बालक 11 साल का हो जाता है तो साहूकार उसे पढ़ने लिखने के लिए काफी भेज देता है.

इसके लिए साहूकार अपने पुत्र के मामा को बुलाकर उसे बहुत ही सारा धन देता है और कहता है कि तुम इस बालक को काशी  में विधियां ग्रहण करवाने के लिए ले जाओ और.  रास्ते में यह कराते जाना जहां भी यह कर आओगे वहां पर ब्राह्मणों को भोजन कराते हुए और दक्षिणा भी देते जाना. 

 इसके बाद दोनों मामा भांजे अपने मार्ग में आगे बढ़ते हैं और अपने पिताश्री के आधार पर रास्ते में यज्ञ कराते और ब्राह्मणों को दक्षिणा दान और भोजन कराते हुए काशी की ओर चल पड़ते हैं. 

लेकिन आगे बढ़ते क्रम में रात्रि में एक नगर पर और रुक जाते हैं वहां लेकिन रुकने के क्रम में वहां पर इन दोनों मामा भांजे का नजर एक राजा की बेटी का विवाह होता है.  लेकिन पता चलता है कि जिस राजकुमार से उस कन्या का विवाह होना था वह एक आंख से काना होता है. लेकिन  इस बात को छुपाने के लिए राजकुमार के पिता एक  चाल सोचती है.

और उस वक्त उस राजकुमार के पिता को साहूकार के पुत्र को देखकर उसके मन में एक विचार आता है.  उसने सोचा क्यों ना इस लड़के को दूल्हा बनाकर राजकुमारी से विवाह करा दो.  और विवाह के बाद इसको धन देकर विदा कर दो और राजकुमार को अपने नगर ले जाऊंगा.  उसके बाद उस राजकुमार के पिता साहूकार के लड़के को दूल्हे का वस्त्र पहनाकर राजकुमारी से विवाह करा देता है.  लेकिन साहूकार का पुत्र ईमानदार था उससे यह बात न्याय संगत नहीं लगी. 

साहूकार के बेटे ने मौका पाते ही राजकुमारी की चुन्नी के पल्ले पर तुम्हारा विवाह तो मेरे साथ हुआ है लेकिन  जिस राजकुमार के संग तुम्हें भेजा जाएगा वह एक आंख से काना है मैं तो काशी पढ़ने जा रहा हूं इस तरह का बात लिख दिया.

जब राजकुमारी ने चुन्नी पर लिखी बातों खोपड़ी तो उसने फौरन जाकर अपने माता-पिता को यह बात बता दी.  सारे बात समझने के बाद राजा ने अपनी पुत्री को विदा नहीं किया.  जिसके कारण पूरे  भारत को खाली हाथ धोने के साथ वापस जाना पड़ा. 

 इधर साहूकार का बेटा और उसका मामा काशी पहुंच जाते हैं वहां जाकर उन्होंने बहुत बढ़िया किया.  अगले साल उस लड़के का आयु जब 12 साल का हुआ उसी दिन यज्ञ फिर से रखा गया.  उसके बाद साहूकार के बेटे ने अपने मामा से कहा कि मेरे तबीयत कुछ ठीक नहीं लग रहा है.  और उस लड़के का मामा ने उसे कहा तुम अंदर जाओ और कुछ देर आराम कर लो.

लेकिन भगवान शिव जी के वरदान अनुसार कुछ ही देर में उस लड़के ने अपना प्राण त्याग दिए.  मृत भांजे को देखकर उसके मामा ने विलाप करना शुरू किया. अचानक उसी वक्त उसी समय भगवान शिव और माता पार्वती उसी रास्ते से गुजर रहे थे.  माता पार्वती ने भगवान से कहा स्वामी मुझे इसके रोने के स्वर सहन नहीं हो पा रही है कृपया इस व्यक्ति का कष्ट  को  तुरंत दूर करें.

 इसके बाद जो भगवान शिव अमृत बालक के पास गए तो भगवान शिव ने कहा अरे यह तो वही साहूकार का पुत्र है जिसे मैंने 12 वर्ष की आयु का वरदान दिया था.  अब इस बालक का आयु पूरी हो चुकी है. लेकिन मात्र भाग से डूबी माता पार्वती ने कहा कि हे भगवान आप इस बालक को और आयु प्रदान करें.  नहीं तो इन के वियोग में इनके माता-पिता भी तड़प तड़प के अपनी प्राण दे देंगे.

 माता पार्वती की इस अनुरोध को स्वीकार करते हुए भगवान शिव जी ने उत्सव कार के लड़के को दोबारा जीवित होने का वरदान दिया.  भगवान शिव जी के कृपा से वह लड़का दोबारा से जीवित हो गया.  और अपने शिक्षा समाप्त करके लड़का अपने  मामा के साथ अपने नगर को चल देता है.

रास्ते में चलते वक्त उन्हें वहीं अगर मिलता है जहां उनकी विवाह हुआ था.  वहां पर दोनों मामा भांजा मिलकर यज्ञ का आयोजन करता है.  उसके बाद वह लड़का अपने राजा ससुर जी को अपनी पहचान दिलाता है.  उसके बाद राजा तुरंत अपने दामाद को अपने महल पर ले जाकर खातिरदारी करती है और अपनी पुत्री को उस लड़के के साथ विदा कर देता है.

इधर वह साहूकार और उनकी पत्नी बहुत दुख के साथ भूखे प्यासे रहकर  बेटे की आने का प्रतीक्षा करने लगता है.  और साहूकार और उनकी पत्नी दोनों मिलकर यह प्राण कर लेते हैं कि यदि उन्हें अपने बेटे की मृत्यु का समाचार मिलता है तो वह दोनों भी अपना प्राण त्याग देंगे.  लेकिन अपने बेटे को जीवित होने का समाचार पाकर वह दोनों बहुत ही प्रसन्न होते हैं. 

उसी रात भगवान शिव ने  उस साहूकार को स्वप्न में आकर कहता है कि – है श्रेष्ठ मानव मैंने तेरे सोमवार के व्रत करने और व्रत कथा  सुनने से मैं प्रसन्न हुआ और मैंने तेरा पुत्र को लंबी आयु प्रदान की है.  इसी प्रकार यदि जो व्यक्ति सोमवार व्रत तक करता है या कथा सुनता है या पड़ता है तो  उसके भी दुख दूर हो जाते हैं और  संपूर्ण मनोकामना भी पूर्ण हो जाता है. 

सावन में कांवर यात्रा का महत्व (Sawan me Kawar Yatra ka Mahatb )

Sawan Somvar Vrat : सावन महीने में कांवर यात्रा का सबसे अधिक महत्व माना जाता है.  हिंदू धर्म में सावन का मतलब कावर यात्रा का महीना के रूप में भी जाना जाता है.  पूरे महीना भगवान शिव की पूजा आराधना  किया जाता है.  कावड़ यात्रा में लोग भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए श्रद्धालु  भगवा वस्त्र धारण करके गंगा नदी या पवित्र नदियों से कावर में जल को एक घड़ा ( कावर एक बांस का बना होता है .

जिसमें दोनों तरफ छोटे-छोटे मटकी के घड़े या कलर्स को बांधा होता है इसी में जल को भरा जाता है ) में बांधकर भगवान शिव का महिमा गाते हुए और बोल बम बोल बम का नारा लगाते हुए पैदल ही श्रद्धालु अपने यात्रा को पवित्र जल लेकर शिवलिंग पर जलाभिषेक करते हैं. ऐसे करने से भगवान शिव प्रसन्न होते हैं और अपने श्रद्धालुओं की मनोकामना को पूर्ण करते हैं.

इस  रावण महीने का त्यौहार में स्त्री एवं पुरुष दोनों के द्वारा अपने-अपने तरीका और श्रद्धा के अनुसार भगवान शिव का पूजा करते हैं. कावड़ यात्रा के बारे में अधिक जानकारी प्राप्त करने के लिए  इस लिंक पर क्लिक करें.

सावन में बेलपत्र का महत्व ( Sawan me Belpatra ka Mahatb )

Sawan Somvar Vrat : हिंदू धर्म के अनुसार भगवान शिव की पूजा में बेलपत्र का बहुत ही विशेष महत्व दिया गया है. कहा जाता है कि एक लुटेरा अपने जीवन यापन करने के लिए रास्ते में चलते हुए मुसाफिरों को लूटा करता था.  इसी क्रम में एक रात जब वह लुटेरा एक पेड़ में बैठकर अपनी शिकार का इंतजार करने लगता है. लेकिन उस रात कोई शिकार नहीं आने के कारण  वह लुटेरा अपने आप को कोसने लगता है और अपने किए पर पश्चाताप करने लगता है. 

इसी क्रम में हुआ जिस पेड़ में बैठा रहता है उस पेड़ के पत्तों को तोड़ तोड़ के नीचे  गिराने लगता है.  आपको बता दें वह  पेड़ बेल का होता है.जब वह लुटेरा उस बेलपत्र को तोड़ के नीचे गिराते रहता है तो नीचे भगवान शिव के लिंग स्थापित होता है.  वहां पर डाकू द्वारा फेंके गए बेलपत्र भगवान शिव लिंग पर जा गिरता है और उसके करुण भाव को देखते हुए. 

भगवान शिव में एक सच्ची श्रद्धा का संचार होता है.  श्रद्धा से प्रसन्न होकर भगवान भोलेनाथ स्वयं उस लुटेरा को दर्शन देते हैं.  और अपनी इस लुटेरा वाली पीढ़ी को समाप्त कर उसे सही राह पर लाने के लिए वरदान देते हैं.  इसलिए भी बेलपत्र का महत्व विशेष रहता है.

 सावन महीना में मनाए जाने वाले अन्य विशेष त्योहार

सावन महीने में मनाए जाने वाले ऐसे कई त्यौहार है जिसके कारण श्रावण को हिंदी कैलेंडर में एक पवित्र महीना के रूप में भी माना जाता है.  साथ ही सोमवार के दिन शिव की विशेष पूजा आजा की जाती है साथ ही व्रत भी रखा जाता है.  इसमें से सावन में मनाए जाने वाले विशिष्ट त्यौहार की लिस्ट नीचे दी हुई है.

दशम व्रत (Dasham Vrat )

दशम व्रत दशम को समर्पित होती है और यह एक गुजराती त्योहार है  जो  गुजरात के परंपराओं के अनुसार इसे रावण के पहले दिन मनाया जाता है.

कृष्ण जन्माष्टमी (Krishna Asthami )

कृष्ण जन्म अष्टमी पूर्णिमा के बाद आठवें दिन कृष्ण के जन्म का प्रतीक के रूप में माना जाता है. जिसमें अमांत परंपरा के अनुसार श्रावण का 23 वा दिन होता है. इस त्योहार को दुनियाभर के हिंदू श्रद्धालु विशेष रूप से वैष्णव परंपराओं के लोग कृष्ण जन्म अष्टमी को काफी धूमधाम से मनाया जाता है.

रक्षाबंधन (Rakshabandhan )

रक्षाबंधन हिंदुओं के बड़े पर्व में से एक माने जाते हैं इसे भारत और नेपाल के कई हिस्सों में राखी पूर्णिमा के नाम से भी मनाया जाता है.  यह त्यौहार पूर्ण रूप से भाइयों और बहनों के बीच के संबंध को दर्शाता है और उसका जश्न मनाता.  इस पर्व को श्रावण पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है और इस पर्व में परिवार में अपने वाहनों अपने भाइयों की रक्षा के लिए राखिया मंगलसूत्र को दाया हाथ में बांधकर मनाती है. इसके बदले भाइयों अपने बहन को महत्वपूर्ण तोहफा भी प्रदान करते हैं.

नारली पूर्णिमा (Narali Purnima )

 नारली पूर्णिमा विशेषकर  पश्चिमी भारत और महाराष्ट्र गुजरात और गोवा के कुछ हिस्सों में श्रावण पूर्णिमा के दिन नारली पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है.  इस दिन समुंद्र के देवता वरुण के सम्मान में समुंद्र को नारियल की भोग लगाया जाता है.  इसी तरह महाराष्ट्र के तटीय क्षेत्र में यानी कि गोकर्ण में मानसून के मौसम के बाद समुद्र को शांत करने के लिए भी नारियल का भोग लगाया जाता है .

नारली पूर्णिमा मछली पकड़ने के समय की शुरुआत तू भी माना जाता है और मछुआरे जो जीवन यापन करने के लिए समुंद्र पर निर्भर रहते हैं. वह लोग वरुण देवता को दान देते हैं ताकि वह समुद्र से भरपुर मछलियां प्राप्त कर सके इस त्यौहार के बाद मछुआरे समुद्र में मछली पकड़ना शुरू कर देते हैं.

 नाग पंचमी (Naag Panchami )

नाग पंचमी भारत के कई हिस्सों में  सावन महीने  की अमावस्या के पांचवे दिन मनाई जाती है.  इस दिन नाग देवता नागा की पूजा की जाती है.  इस त्यौहार में विशेषकर लोग नाग देवता को दूध और धान के लावे  और दूध को प्रसाद के रूप में भोग लगाते हैं.  सावन महीने के अंतिम दिन  महाराष्ट्र के किसान लोग पोला  के रूप में भी मनाते हैं इस दिन किसान लोग बैल की पूजा भी करती है.  

बसंत पंचमी (Basant Panchami )

बसंत पंचमी मैं कन्नड़ अमावस के पांचवे दिन मनाई जाती है 1996 ईस्वी में इसी दिन का लिंगायत धर्म गुरु बस्तवा भगवान में विलीन  हो गए थे इसलिए भी.  इस त्यौहार को मनाया जाता है.

अवनी अवित्तम (Avani Avittam )

अवनी अवित्तम त्योहार खास करके महाराष्ट्र,  गोवा,  केरल,  आंध्र प्रदेश,  तमिल नाडु,  कर्नाटक,  और उड़ीसा में सहित भारत के दक्षिणी और मध्य भागो के रहने वाले लोग श्रावण पूर्णिमा का दिन अवनी अवित्तम या उपागम का त्यौहार मनाते हैं.

बलराम जयंती (Balram Jayanti )

सावन पूर्णिमा के दिन बलराम जयंती समारोह के रूप में भी मनाया जाता है.  इसमें  भगवान कृष्ण के बड़े भाई बलराम का जन्म सावन पूर्णिमा के दिन होने के कारण.  सावन पूर्णिमा को बलराम जयंती मनाया जाता है.

गम्हा पूर्णिमा (Gamha Purnima )

यह त्यौहार उड़ीसा में मनाई जाती है त्यौहार  मैं उड़ीसा में सभी पालतू गायबबैल को सजाया जाता है और उनकी पूजा की जाती है.  और विभिन्न प्रकार की पकवान मिठाइयां बनाई जाती है और परिवारों और रिश्तेदारों और दोस्तों के साथ आदान प्रदान की जाती है.

इस त्यौहार में उड़ीसा जगन्नाथ संस्कृत में  भगवान कृष्ण और राधा सावन के वर्षा ऋतु का आनंद लेते हैं जो शुक्ल पक्ष की एकादशी से शुरू होता है और राखी पूर्णिमा पर झूलन यात्रा नामक त्योहार के साथ समाप्ति होती है.  इस त्यौहार में भगवान कृष्ण और राधा की प्रतिभा को झूलन नामक झूले पर खूबसूरती के साथ सजाया जाता है और इसे काफी धूमधाम से मनाया जाता है.

कजरी पूर्णिमा (Kajari Purnima )

भारत के मध्य भाग में जैसे मध्य प्रदेश छत्तीसगढ़ और झारखंड में सावन पूर्णिमा का दिन कजरी पूर्णिमा के रूप में भी मनाया जाता है यह किसान और पुत्रवती महिलाओं के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण दिन माना जाता है.  सावन अमावस्या के नौवें दिन से कजरी उत्सव की तैयारियां शुरू हो जाती है.  और नौवें दिन को कजरी नववी कहा जाता है जिन महिलाओं के बेटे होते हैं वह कजरी पूर्णिमा  के दिन तक विभिन्न पूजा भी करती है.

पवित्रोपना (Pavitropana)

यह त्यौहार भुज गुजरात के कुछ हिस्सों में सावन पूर्णिमा के दिन पवित्रोपना  त्योहार के रूप में भी मनाया जाता है.  इस पवित्र दिन हो श्रद्धालु भक्तजन भगवान शिव की भव्य रूप से पूजा  करके मनाते हैं.

पवित्र एकादशी(Pavita Ekadasi )

पवित्र एकादशी के दिन गुजरात और राजस्थान में वैष्णव इससे पुष्टीमार्ग जिसे अनुग्रह के मार्ग के जन्म के रुप में मनाते हैं.  इसी दिन कृष्ण भगवान वल्लभाचार्य के सामने प्रकट हुए थे.  और वल्लभाचार्य ने उन्हें एक धागा प्रदान किया था जो एक पवित्र धागा के रूप में माना जाता है.  उसी दिन से हर साल पवित्र एकादशी भी मनाई जाती है.  इस पवित्र धागा को एकादशी से लेकर रक्षाबंधन तक चढ़ाए जाते हैं.

जनों पूर्णिमा (Janau Purnima )

सावन पूर्णिमा के दिन जनों पूर्णिमा के रूप में भी मनाया जाता है इस दिन जनों पूर्णिमा यानी कि पवित्र धागा को मनाया जाता है. इस दिन  ब्राह्मण समाज के लोग पवित्र धागा यानी कि जनों को बदलने का त्योहार भी मनाते हैं और इसे यजुर देव नूतन सहित उपकरण के रूप में भी जाना जाता है.

सलोनो (Salono )

पंजाब और हरियाणा जैसे राज्य में रक्षाबंधन के अलावा सलोनो  का भी त्यौहार मनाते हैं. सलोनो इस त्यौहार में पुजारियों द्वारा बुराई से सुरक्षा के लिए लोगों की कलाई पर ताबीज बांधकर मनाया जाता है.  इस सलोनो  त्योहार को स्थानीय संतो को समर्पित किया जाता है जिसमें भक्त ऐसे ताबीज प्राप्त करते हैं. सलोनो  त्योहार में बहनें बुराई से बचने के लिए भाइयों की कलाई में धागा बनती है.  दोनों त्योहारों का प्रथा समान होने के बावजूद भी सलोनो  पर्व रक्षाबंधन से अलग उत्सव के साथ मनाया जाता है.

पोला (Pola )

पोला त्यौहार बैल और सांड के सम्मान के लिए मनाया जाता है विशेषकर यह त्यौहार महाराष्ट्र के किसान द्वारा मनाया जाता है. यह त्योहार श्रावण के अंतिम दिन अमावस्या के दिन बैल और सांड की पूजा करके मनाया जाता है.

हरियाली तीज (Hariyali Teej )

सावन शुक्ल पक्ष की तृतीया को हरियाली तीज का  त्योहार मनाया जाता है.  इस त्यौहार में नवविवाहिता कन्या है अपने मायके आती है और अपने पति की कामना के लिए दीर्घायु के लिए इस पर्व को मनाती है.  इसी तरह कुंवारी कन्या अपनी वर की कामना  हेतु भी यह बर्थ करती है.  इस त्यौहार में माता गौरी को 16 सिंगार चढ़ाया जाता है.  इस तरह इस त्यौहार को कन्या और महिलाएं पूरे हर्षोल्लास के साथ मनाती है.

श्रावणी मेला (Shravavi Mela )

 श्रावणी मेला को विशेषकर झारखंड के देवघर में एक प्रमुख त्योहार के रूप में मनाया जाता है.  जिसमें हजारों में भगवाधारी 30 यात्री बिहार के सुल्तानगंज में गंगा से लगभग 105 किलोमीटर पैदल सरकर पवित्र जल  लाते हैं और झारखंड के देवघर में अवस्थित बैजनाथ  भगवान की  लिंग पर  जलाभिषेक करके  अपनी कावड़ यात्रा को पूर्ण करते हैं. श्रावण वार्षिक कावर यात्रा का भी समय होता है जो शिव भक्तों की वार्षिक तीर्थयात्री जैसे कि कांवरियों के नाम से भी जाना जाता है. 

सावन महीना में एकादशी की महत्व

सावन महीने में एकादशी का भी महत्व होता है सावन महीने में दो एकादशी होती है.  पहला  पुत्रदा एकादशी  है  यह एकादशी शुक्ल पक्ष में आती है. दूसरा कामिका एकादशी है इसे कृष्ण पक्ष एकादशी भी कहा जाता है.

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 निष्कर्ष

इस लेख में हमने जाना सावन महीने का बारे में विस्तार में आशा करता हूं आप लोगों को यह लेख जरूर पसंद आई हो यदि लेख पसंद आई हो या हमें कोई सुझाव है सलाह देना हो तो नीचे कमेंट में हमें कमेंट जरूर करें धन्यवाद.

FAQs 

Q. Sawan सोमवार व्रत कितने करने चाहिए?

A. इस बार 2023 में सावन में कुल 8 सोमवार की व्रत रखना चाहिए.

Q. सावन सोमवार व्रत में क्या खाया जा सकता है?

A. अन्य पदार्थ को छोड़कर फल फूल,  शरबत जूस,  जो स्थित का कर सकते हैं.

Q. सावन में क्या नहीं खाना चाहिए ?

A.  हिंदू शास्त्र के अनुसार सावन  का महीना भगवान शिव का महीना होता है ऐसे दिनों में घर में लहसुन प्याज मांग मछली शराब इत्यादि  इत्यादि खाने से बचना चाहिए.

Q. सावन पर कौन सा रंग पहनना है?

A. सावन में हरे रंग का वस्त्र पहनना चाहिए.

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