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Solah Somvar Vrat Katha : सोलह सोमवार व्रत कथा, 16 Somvar Vrat Katha, व्रत कब से प्रारंभ करें ? पूजा की सामग्री, पूजा करने की विधि

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Solah Somvar Vrat Katha
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 Solah Somvar Vrat Katha : हर साल हिंदी महीने का चौथा महीना श्रावण माह होता है. हिंदू धर्म के अनुसार श्रावण महीना को भगवान शिव का महीना भी कहा जाता है. इस महीना में लोग भगवान शिव का पूजा और उपाय शिद्दत से करते हैं. जो लोग सावन महीना में भगवान शिव का पूजा और उपवास रखता है. उनके संपूर्ण मनोकामना भगवान शिव पूरा कर देते हैं. यदि आप भी भगवान शिव का भक्त हैं और भगवान शिव को खुश करने के लिए सोलह सोमवार का व्रत रखना चाहते हैं तो  यहां पर हम जानेंगे सोलह सोमवार व्रत रखने की विधि और भगवान शिव का कथा के बारे में विस्तार.

Table of Contents

नामसोमवार व्रत कथा
  धर्महिंदू धर्म
उद्देश्यसर्व कामना पूर्ति हेतु
सामान पर्वसप्ताह के अन्य दिवस
कौन सी भगवान के लिएचंद्र और भगवान शिव के लिए 

सोलह सोमवार व्रत क्यों रखा जाता है ? ( Solah Somvar Vrat Katha mahatb )

 हिंदू धर्म के अनुसार सोलह सोमवार का व्रत कोई भी पत्नी अपने पति और परिवार की लंबी आयु और दांपत्य जीवन सुखमय के लिए और  कन्या कुंवारी लड़कियां अपनी मनपसंद जीवनसाथी पाने के लिए सोलह सोमवार का व्रत रखा करती है.

 सोलह सोमवार व्रत कब से प्रारंभ करें ?( Solah Somvar Vrat Kaise Suru Kare?)

 हिंदू धर्म और विशेषज्ञों के अनुसार सोलह सोमवार व्रत आपको श्रावण महीना के पहला सोमवार से शुरू कर लेना चाहिए.  ऐसे करने से आपको और भी ज्यादा फल दाया होगा.

सोलह सोमवार व्रत सबसे पहले किसने रखा ?

 हिंदू धर्म की पौराणिक मान्यताओं के अनुसार सोलह सोमवार का व्रत का शुरुआत सबसे पहले माता पार्वती ने खुद किया था और माता पार्वती की कड़ी तपस्या और व्रत के प्रभाव  के वजह से माता पार्वती को भगवान शिव जी पति के रूप में प्राप्त हुए थे. 

 सोलह सोमवार व्रत कब से रखा जाता है?

 सोलह सोमवार उपवास श्रावण महीना के प्रथम सप्ताह के पहला सोमवार को रखा जाता है और यह व्रत सौम्या निहित चंद्र या भगवान शिव जी के लिए रखा जाता है.

 सोलह सोमवार व्रत रखने के लिए कौन-कौन सी पूजा की सामग्री चाहिए ?

सबसे पहले तो आपको भगवान शिव जी की मूर्ति,  बेलपत्र, धूप, दीप,  धतूरा,  सफेद चंदन,  भांग,  गंगाजल,  इत्र,  सफेद वस्त्र,  अष्टगंध,  और नवेद चाहिए. 

नवेद कैसे तैयार करें ? ( Navedh Kaise Tayar Kare ?)

भगवान शिव को भोग लगाने के लिए नवेद आधा किलो गेहूं के आटे को घी में भूनकर उसमें गुड़ मिलाकर बनाया जाता है.

सोलह सोमवार के व्रत की पूजा करने की विधि (Solah Somvar Vrat Ka Puja Or Vidhi )

  • सबसे पहले तो आपको अपने हाथ में अक्षत तथा फूल लेकर दोनों हाथ जोड़कर भगवान शिव को नमस्कार करें.
  •  उसके बाद हाथ में लिए हुए फूल और अक्षर भगवान शिव को अर्पण करें.
  •   उसके बाद  भगवान शिव पर जलाभिषेक करें.
  • भगवान शिव को जलाभिषेक करने के बाद अब सफेद वस्त्र को पहन ले.
  • अब सफेद चंदन से भगवान  शिव को तिलक लगाए साथी उस तिलक पर अक्षत जरूर लगाएं.
  • अब भगवान शिव को सफेद पुष्प,  धतूर,  भांग,  बेलपत्र एवं पुष्पमाला अर्पण करें.
  •  साथ ही  भगवान शिव को   अष्टगंध और दुख अर्पित कर कर दिखाएं.
  • अंत में भगवान शिव को भोग के रूप में ऋषि फल या बेल और जो नवेद तैयार हुआ है उसका भोग लगाएं. 
  • अंत में भगवान शिव की प्रार्थना में सोलह सोमवार का व्रत कथा पढ़ें और लोगों को सुनाएं. 

सोलह सोमवार व्रत करने का संकल्प कैसे लें ? ( Solah Somvar Vrat Sankalp)

यदि आप सोलह सोमवार का व्रत करना चाहते हैं तो सबसे पहले आपको किसी भी पूजा या व्रत को आरंभ करने के लिए एक संकल्प होना चाहिए.  इसके लिए आपको व्रत को करने से पहले व्रत की पहले दिन ही आपको संकल्प ले लेना चाहिए.  उसके बाद ही आप नियमित रूप से पूजा और व्रत रखना शुरू करें. संकल्प करने के लिए आपको सबसे पहले हाथ में जल,  अक्षत, पान,  सुपारी,  और कुछ दक्षिणा लेकर संकल्प करें.  और अंत में सारे वस्तुओं को भगवान शिव की मूर्ति के आगे अर्पण करें.

16-Somvar-Vrat-Katha
Bhagwan Shiv

सोलह सोमवार व्रत कथा (Solah Somvar Vrat Katha )

1 दिन की बात है भगवान शिव माता पार्वती के साथ  मृत्युलोक में भ्रमण कर रहे थे.  भ्रमण करते करते दोनों विदर्भ देश की अमरावती नगर में पहुंच जाते हैं. अमरावती नगर एक बहुत ही सुंदर और  सुख सुविधा से पूर्ण था.  उसी नगर के राजा ने वहां पर एक अत्यंत सुंदर भगवान शिव का मंदिर भी बनाया था. इसीलिए भगवान शिव और माता पार्वती दोनों उसी मंदिर रहने लगे. 1 दिन की बात है माता पार्वती जी ने बातों बात पर भगवान शिव को चौसर खोलने को कहा. 

और भगवान शिव भी राजी हो गए और चौसर को  खुलने लगे. उसी मंदिर में एक पुजारी रहा करता था जो दैनिक मंदिर में पूजा और आरती किया करता था. उसी वक्त माता पार्वती उस पुजारी से पूछा कि बताओ यह जूसर मैं किसका जीत होगी ? वह पुजारी भगवान शिव का बहुत बड़े भक्त होने के कारण उस पुजारी ने माता पार्वती को झटपट कह दिया कि भगवान शिव ही जीतेंगे.

उसके बाद  चौसर का खेल खत्म होते ही माता पार्वती जीत जाती है. और भगवान शिव हार जाते हैं. माता पार्वती को उस पुजारी को झूठ बोलने का अपराध धारा आती है. और तुरंत श्राप देने लगती है.  लेकिन माता पार्वती को क्रोधित देखकर भगवान शिव माता पार्वती को रोकते हुए बोलते हैं कि यह तो भाग्य का खेल है इसमें पुजारी  कोई गलती नहीं है.  लेकिन फिर भी माता पार्वती भगवान शिव जी का बात नहीं सुनती है और तुरंत उस पुजारी को कोढ़ी होने का श्राप दे देती है.माता पार्वती के श्राप से वह पुजारी  कोढ़ से ग्रस्त हो जाता है. काफी समय तक वह पुजारी कोढ़  से ग्रसित होकर रहता है. 

कई दिनों के बाद देवलोक से अप्सराएं उसी मंदिर में जाती है और  वहां पर उस पुजारी को देखती है जो कोढ़  से ग्रसित होता है.  यह देखकर  अप्सराएं  उस पुजारी को कोढ़  होने का कारण पूछती है.  और पुजारी उन अफसरों को अपने साथ घटी संपूर्णा घटनाएं अप्सराओं के सामने सुनाता है.  और अप्सराएं पूरा घटना सुनने के बाद उस पुजारी को कोढ़  से  मुक्ति पाने के लिए सोलह सोमवार का व्रत रखने का सलाह देती है.

और उस पुजारी ने उन अप्सराओं को सोलह सोमवार व्रत रखने की विधि पूछा,  तो अप्सराओं ने बताया कि श्रावण के पहला सोमवार के दिन नहा धोकर साफ कपड़े पहन लेना और आधा किलो आटे से भगवान शिव को भोग लगाने के लिए नवेद बना लेना.  और उस नवेद का 3 भाग लगाकर.  प्रदोष काल में भगवान शिव की पूजा आराधना करना.  और उस नवेद की एक तिहाई हिस्से को आरती में आने वाले लोगों को प्रसाद के रूप में बांट देना. 

इस तरह तुम हर सोमवार को सोलह सोमवार तक यह विधि को अपनाना.  और अंत में 17 में सोमवार को एक चौथाई गेहूं के आटे से चूरमा बना कर भगवान शिव को भोग लगाना और लोगों पर बांट देना.  इस तरह तुम सोलह सोमवार व्रत पूरा करोगे तो तुम्हारा कोढ़  दूर हो जाएगा और तुम खुशी-खुशी अपना जीवन यापन करोगे.

1 दिन फिर भगवान शिव और माता पार्वती दोबारा उस मंदिर में आते हैं और फिर उस पुजारी को एकदम स्वस्थ देखकर.  माता पार्वती ने उस पुजारी को स्वस्थ लाभ होने का राज पूछा. उस पुजारी ने कहा मैंने सोलह सोमवार का व्रत किया और उसके कारण मेरा कोढ़  पूर्ण रूप से ठीक हो गया.  माता पार्वती भी सोलह सोमवार व्रत के बारे में सुनकर बहुत ही प्रसन्न हुई. 

और माता पार्वती ने भी यह व्रत को अपनाया जिसके कारण माता पार्वती के पुत्र कार्तिकेय घर लौट आया और आज्ञाकारी बन गया.  माता पार्वती के  पुत्र कार्तिकेय ने अपनी माता से उनके मानसिक परिवर्तन का कारण पूछा.  तो माता पार्वती ने  इन सब का पीछे सोलह सोमवार के व्रत के बारे में कार्तिकेय को बताया और पुत्र कार्तिकेय सुनकर बहुत ही प्रसन्न हुआ.

उसके बाद कार्तिकेयन ने भी अपने बहुत ही करीबी मित्र से मिलने के लिए सोलह सोमवार का व्रत किया और 16 सोमवार होने पर उनका मित्र उनसे मिलने विदेश से वापस आया. कार्तिकेय के मित्र ने इस राज्य का कारण पूछा तो उन्होंने सोलह सोमवार व्रत की महिमा बताएं यह सुनकर वह ब्राह्मण मित्र भी बहुत प्रसन्न हुआ और उस ब्राह्मण मित्र ने अपने विवाह के लिए सोलह सोमवार का व्रत रखने का संकल्प लिया. 

 1 दिन की बात है एक राजा अपनी पुत्री के विवाह की तैयारियां कर रहा था.  उस विवाह में राजकुमारी से विवाह करने के लिए बहुत सारे नगर से राजकुमार आए हुए थे.  राजा ने वहां पर एक शर्त रखा.  और कहा जो भी राजकुमार के गले पर हथिनी वरमाला डालेगी उसके साथ ही मेरी सुपुत्री का विवाह होगा.  उस वक्त वह ब्राह्मण भी वहीं पर मौजूद था.  और भाग्य से हथिनी ने उस  ब्राह्मण के गाने पर वरमाला डाल दी और सत्य अनुसार राजा ने अपनी सुपुत्री का विवाह उस ब्राह्मण के साथ कर दिया.

एक दिन राजकुमारी ने उस ब्राह्मण से पूछा आपने ऐसा क्या पुण्य का काम किया था जिसके कारण वह हथिनी ने दूसरी राजा को छोड़कर  आपके ही गले में वरमाला डाला.  उस ब्राह्मण ने अपने राजकुमारी पत्नी को कहा प्रिय महीने अपने मित्र कार्तिकेय के कहने पर सोलह सोमवार का व्रत किया था.  उसी के परिणाम से तुम लक्ष्मी जैसे दुल्हन मुझे मिली. 

राजकुमारी भी यह बात सुनकर बहुत ही प्रसन्न हुई और उसने भी अपने पुत्र प्राप्ति के लिए सोलह सोमवार का व्रत रखा.  परिणाम स्वरूप  उन्हें एक सुंदर पुत्र प्राप्ति हुई और एक पुत्र का जन्म हुआ.  जब वह पुत्र बड़ा हुआ तो उस पुत्र ने अपनी माता से पूछा कि आपने ऐसे क्या किया जिसके कारण आपको मेरे जैसा मित्र मिला.  पुत्र की माता ने अपने पुत्र को सोलह सोमवार व्रत की  महिमा बताइए.

इस बात को सुनकर उसने भी राज पाठ की इच्छा के लिए सोलह सोमवार का व्रत रखा.  उसी समय एक राजा अपनी पुत्री के विवाह के लिए बर  तलाश कर रहा था तो राजा ने उस लड़के को विवाह के लिए उचित बताया.  और राजा ने अपनी पुत्री का विवाह लड़के के साथ कर दिया.  कुछ सालों कोई बात जब राजा की मृत्यु हो गई  तो वह लड़का एक राजा बन गया क्योंकि उस राजा का कोई पुत्र नहीं था.  उस लड़की को राजपाट मिलने के बाद वह फिर भी सोलह सोमवार का व्रत करता रहा. 

एक दिन जब 17 सोमवार व्रत पर उसकी पत्नी को भी पूजा के लिए शिव मंदिर आने को कहा गया लेकिन उसने खुद आने से बजाया अपनी दासी को भेज दी. उस ब्राह्मण पुत्र के पूजा खत्म होने के बाद एक आकाशवाणी हुई उस आकाशवाणी में ऊपर से आवाज आई और कहा तुम अपनी पत्नी को अपने महल से दूर रखो नहीं तो तुम्हारा विनाश हो जाएगा,  वह ब्राह्मण के पुत्र को यह सुनकर बहुत ही आश्चर्य चकित हुआ.

 वह लड़का अपना  महल लौट आता है और वहां पर अपने दरबारियों को भी यही बात बताता है.  लेकिन दरबारियों ने उल्टे उस लड़के को कहा की जिसकी वजह से तुम्हें यह राजपाट मिली है अब तू उसी को  मैहर से बाहर निकालेगा ?   लेकिन फिर भी वह लड़का ने अपनी राजकुमारी को महल से बाहर निकाल दिया. 

 महल से निकलने के बाद व राजकुमारी भूखी प्यासी दर दर भटकते हुए एक अनजान नगर पहुंच जाती है.  वहां पर एक बूढ़ी औरत धागे  बेचने  के लिए बाजार की ओर जा रही थी.  जैसे ही उस बूढ़ी औरत का नजर उस राजकुमारी पर जाती है.  तो उस राजकुमारी का मदद करते हुए उसके साथ व्यापार में मदद करने को कहती है.  राजकुमारी मान जाती है और राजकुमारी भी एक टोकरी अपने सर पर रख लेती है. कुछ दूरी तक चलने के बाद एक तूफान आता है और वह टोकरी उड़ जाती है.  यह देखकर बूढ़ी औरत रोने लगती है और उस राजकुमारी को  मनहूस बताते हुए चले जाने को खाती है.

उसके बाद वह राजकुमारी एक तेली के घर पहुंचती है वहां पहुंचते ही सारे तेल के घड़े फूट जाते हैं और तेल बहने लगता है.  उस तेली ने भी उस राजकुमारी को मानो उस मानकर वहां से भगा देता है. उसके बाद राजकुमारी एक सुंदर तालाब के पास पहुंच जाती है और वहां पर पानी पीने लगती है लेकिन उस तालाब का पानी भी सूख जाता है उस तालाब में बच्चे खुद से पानी में कीड़े चलने लगता है और पानी बहुत ही गंदा हो जाता है. 

फिर भी अपने दुर्भाग्य को कोसते हुए राजकुमारी उसी गंदे  कीड़े वाली पानी को  पी लेती है.  और फिर एक पेड़ के नीचे जाकर सो जाती है.  जैसे उस पेड़ के नीचे जाकर सोती है उस पेड़ के सारे पत्तियां झड़ जाती है.  अब वह राजकुमारी जो भी पेड़ के पास जाती है उस पेड़ का पत्ता अपने आप गिरने लग जाता था.

ऐसा देखकर वहां के लोग भागते हुए मंदिर के पुजारी के पास  पहुंच जाते हैं और पुजारी को उस राजकुमारी  के बारे में सूचना देते हैं.  पुजारी उस राजकुमारी से मिलने जाती है और राजकुमारी का दर्द समझते हुए पुजारी कहता है  बेटी तुम मेरी परिवार के साथ रहो मैं तुम्हें अपनी बेटी की तरह रखूंगा,  तुम्हें मेरी आश्रम में कोई दिक्कत नहीं होगी.  इस तरह वह राजकुमारी पुजारी के आश्रम में रहने लगी . जब भी हुआ राजकुमारी खुद से खाना बनाती और पानी लाती उसमें भी कीड़े पड़ जाने लगे.

ऐसा देखकर वह पुजारी आश्चर्यचकित हो जाता है.  और कहता है बेटी तुम्हारे ऊपर यह कौन सा सांप है जो तुम्हारी ऐसी हालत हुई है.  राजकुमारी ने पूरा वृतांत  बताते हुए कहती है कि वह शिव पूजा में न जाकर अपने दासी को भेजने के कारण बताती है. फिर पुजारी में राजकुमारी को कहा तुम शिवजी का आराधना करो और साथी सोलह सोमवार का व्रत करो जिससे तुम्हारा सारा दुख कष्ट खत्म हो जाएगा.

राजकुमारी ने सोलह सोमवार का व्रत करना शुरू किया.  और अंत में 17 वा सोमवार पर  ब्राह्मण पुत्र उसके बारे में सोचने लगा. वह कहां होगी मुझे उसकी तलाश करनी चाहिए इत्यादि,  इसीलिए उस ब्राह्मण पुत्र ने अपने दरबारियों को अपने पत्नी को ढूंढने को कहा.  दरबारियों ने राजकुमारी को चारों और ढूंढने लगा.  अंत में दरबारियों को पता चलता है कि राजकुमारी पुजारी के घर में है. दरबारियों उस पुजारी के घर पहुंच जाते हैं और पुजारी से राजकुमारी को घर ले जाने को कहते हैं.  लेकिन पुजारी  ने इस बात  से इनकार  कहता है अपने राजा को कहो खुद आकर अपने राजकुमारी को ले जाओ.

दरवा दिया वापस महल में जाते हैं और पूरा वृतांत राजा को बताता है.  उसके बाद राजा खुद अपने राजकुमारी को वापस लाने के लिए महल से पुजारी के घर जाता है.  और अपनी राजकुमारी को वापस महल ले जाता है.  इस तरह सोलह सोमवार का व्रत  करने वालों की संपूर्ण मनोकामना पूर्ण हो जाती है. 

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 निष्कर्ष

 इस लेख में हमने जाना सोलह सोमवार व्रत कथा के बारे में विस्तार  आशा करता हूं आप लोगों को यह लेकर जरूर पसंद आई हो.  यदि आपको इस लेख संबंधी कोई सुझाव या करना है तो नीचे कमेंट बॉक्स में कमेंट जरूर करें धन्यवाद.

FAQs 

Q.16 सोमवार व्रत कब से प्रारंभ करें ?

A. हिंदू धर्म और विशेषज्ञों के अनुसार सोलह सोमवार व्रत आपको श्रावण महीना के पहला सोमवार से शुरू कर लेना चाहिए.  ऐसे करने से आपको और भी ज्यादा फल दाया होगा.

Q. 16 सोमवार व्रत क्यों रखा जाता है ?

A. हिंदू धर्म के अनुसार सोलह सोमवार का व्रत कोई भी पत्नी अपने पति और परिवार की लंबी आयु और दांपत्य जीवन सुखमय के लिए और  कन्या कुंवारी लड़कियां अपनी मनपसंद जीवनसाथी पाने के लिए सोलह सोमवार का व्रत रखा करती है.

Q. 16 सोमवार व्रत कब से रखा जाता है?

A. सोलह सोमवार उपवास श्रावण महीना के प्रथम सप्ताह के पहला सोमवार को रखा जाता है और यह व्रत सौम्या निहित चंद्र या भगवान शिव जी के लिए रखा जाता है.

Q. 16 सोमवार व्रत के लिए कौन-कौन सी पूजा की सामग्री चाहिए ?

A. सबसे पहले तो आपको भगवान शिव जी की मूर्ति,  बेलपत्र, धूप, दीप,  धतूरा,  सफेद चंदन,  भांग,  गंगाजल,  इत्र,  सफेद वस्त्र,  अष्टगंध,  और नवेद चाहिए. 

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